मै उसको कैशे समझाऊ ‘अखिर तू उसि के लिये  मचलता है! दिल की क्या गलती बो इतनी अच्छी  है! हि  अब मै दिल से यह भी नही  कह सकता हु तू अपने मनमानी मत किया कर तेरा कोई तेरा कोई अधिकार नही है ! 
 अरे दिल भी क्या करे कुछ अधिकार उसको भी मिलते है  समझ नही आता अब तो  की मुझे समझना  या  मेरे दिल को किसी को तो समझना होगा ! उसे तुमारे लिये  लिये अपना कीमति वक़्त वर्बाद करना नही आता  समझ जा ये दिल  कि उसके पास  वक़्त है लेकिन तेरे लिये नही  फिर सोचता हू कुछ मज़्बुरी होगी उसकी फिर भी  !!!!दिल को खुस रखने के लिये  यह खयाल अच्छा है !!!!!मेरा दिल बार -बार  यह पूछता कोई किसी को इतना  कैसे  सता सकता है!!!! !!!!क्या उसका दिल नही करता होगा  आखिर मेरे पास भी दिल है मुझसे तो नही सताना आता किसी को !!!!!!!!!???क्या उसको पुरी ज़िंदगी  मान लेना सही होगा  (अगर नही ) तो  फिर सही क्या है !!   इस  सही और गलत की बिच इस तरह  फस गया की  ”””’ मानो अलादीन  का  चिराग का जिन  समझने का हुनर मुझे नही समझना  किसी  को इतना क्यो समझू आखिर मेरे बारे मै  कौन समझता है (मै  ) 

जब तक उनसे मुलाकात

दिल क्या करे =……(Indrajeet singh sikarwar)